Tuesday, 22 June 2021

स्व० श्री हुकुम सिंह बोरा

एक परिचय

राष्ट्र समर्पित स्वंतत्रता संग्राम सेनानियों की वीर भूमि बौरारौ घाटी के ऐतिहासिक नगर सोमेश्वर में जन्मे स्व0 श्री हुकुम सिंह बोरा का नाम देश के स्वतंत्रता आंदोलन में सम्मिलित विख्यात रणबाकुरों की सूची में प्रमुख स्थान पर लिया जाता है।

नैसर्गिक सौन्दर्य के लिए विश्व विख्यात, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की आध्यात्मिक भूमि कौसानी की तलहटी में बसे सोमेश्वर के ग्राम फल्या (मल्लाखोली) में सन् 1917 को स्व0 श्री प्रेम सिंह बोरा जी के घर जन्मे आप बचपन से ही संघर्षशील प्रवृत्ति एवं ओजस्वी स्वभाग से ओत-प्रोत रहे।

इनकी प्रारम्भिक शिक्षा सोमेश्वर से हुई। आरम्भिक शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् 6 जनवरी, 1938 में तत्कालीन 419 हैदराबाद डिवीजन में भर्ती हो गए। तत्पश्चात् इन्होनें द्वितीय विश्व युद्व में ब्रिटिश सेना की तरफ से लड़ते हुए अपनी अदम्य साहस एवं वीरता का परिचय दिया। वर्ष 1942 में ब्रिटिश सेना छोड़ नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा गठित आजाद हिन्द फौज में राष्ट्र के प्रति अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के भाव के साथ स्वतंत्रता संग्राम में कूद पडे़।

 नेताजी के “तुम मुझे खून दो, मै तुम्हे आजादी दूॅगा” के ओजस्वी नारे से प्रेरित होकर स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलनों में अपने सक्रिय योगदान के कारण कई बार जेल गए। वर्ष 1943 से 1945 तक दो वर्ष के कठोर कारावास के लिए कलकत्ता जेल में भी रहना पड़ा। सन् 1946 में इन्हें कलकत्ता के कैम्प जेल से निर्वस्त्र रिहा किया गया। जेल की कठोर यातनाओं एवं मानसिक प्रताड़नाआें के कारण इनकी मानसिक स्थिति पर भी बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। सन् 1938 से 1946 तक अपने निकट सम्बंधियों से किसी भी प्रकार का सम्पर्क न कर पाने के कारण परिजनों ने उनके जीवित होने की आशा भी छोड़ दी थी।

अतः जेल से रिहा होने के पश्चात् श्री बोरा जी जब वर्ष 1946 में अपने घर मल्लाखोली(सोमेश्वर) पहुॅचे तो इनकी विक्षिप्त दशा देख प्रथम दृष्ट या इन्हें अपने ही परिवार द्वारा पहचान पाना मुश्किल हुआ, सम्बंधियों द्वारा पहचानने से इंकार भी किया गया लेकिन वास्तविकता से अवगत होने के पश्चात् सम्बंधियों द्वारा इनको पहचाना गया। तत्पश्चात् स्व0 बोरा जी ने अपने पैतृक स्थान ग्राम- फल्या मल्लाखोली में स्थायी रूप से जीवन यापन करने लगे।

स्व0 श्री बोरा देश के प्रति अत्यधिक समर्पित थे जिसका प्रमाण इनके जीवनवृत्त से मिलता है। जीवन के अंतिम दिनों तक आपने देश-प्रेम नहीं छोड़ा एवं क्षेत्र के स्कूलों के बच्चों में भी आजादी की अलख जगाते रहें।

28 दिसम्बर 1989 को रानीखेत के समीप चौकुनी में हुए भयावह बस अग्नि-काण्ड ने श्री हुकुम सिंह बोरा को हमसे सदा के लिए छीन लिया। जिसमें श्री बोरा जीवित जलकर पंचतत्वों में विलीन हो गए।

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